काजू कतली के वर्क ने पहुंचाया जेल, 31 साल तक चली कानूनी लड़ाई; आखिरकार हलवाई ने जीता केस

अहमदाबाद
काजू कतली पर चमचमाता वर्क देखकर शायद ही कोई सोचे कि इसकी वजह से किसी मिठाई दुकानदार को तीन साल की जेल की सजा हो सकती है। गुजरात में ऐसा ही एक मामला सामने आया। काजू कतली पर चांदी की जगह एल्युमिनियम फॉइल मिलने के बाद मिठाई दुकानदार के खिलाफ मामला दर्ज हुआ और निचली अदालत ने उसे तीन साल जेल की सजा सुना दी। करीब तीन दशक तक चले इस कानूनी विवाद में आखिरकार गुजरात हाई कोर्ट से दुकानदार को राहत मिली। दिलचस्प बात यह है कि दोनों लैब की जांच में एल्युमिनियम फॉइल मिलने के बावजूद दुकानदार केस जीत गया।
1995 में शुरू हुआ था पूरा मामला
मामला 9 मार्च 1995 का है। फूड इंस्पेक्टर ने गुजरात के सूरत जिले के व्यारा में भानुभाई की मिठाई की दुकान से 96 रुपये की काजू कतली खरीदी। इसका सैंपल जांच के लिए भुज के पब्लिक एनालिस्ट के पास भेजा गया।
जांच में सामने आया कि काजू कतली पर चांदी के बजाय एल्युमिनियम का वर्क इस्तेमाल किया गया था। ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक इसके बाद दुकानदार और उसके पार्टनर्स के खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ फूड अडल्टरेशन 1955 (Prevention of Food Adulteration Act) के तहत कार्रवाई शुरू हुई।
दुकानदार ने पहली लैब रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए दोबारा जांच की मांग की। इसके बाद सैंपल सेंट्रल फूड लेबोरेटरी गाजियाबाद भेजा गया। लेकिन यहां से भी दुकानदार को राहत नहीं मिली। दूसरी जांच में भी एल्युमिनियम फॉइल मिलने की पुष्टि हुई और सैंपल को मिलावटी बताया गया।
निचली अदालत ने सुनाई 3 साल की जेल
मामला अदालत पहुंचा और लंबी सुनवाई के बाद 24 नवंबर 2006 को न्यायिक मजिस्ट्रेट ने भानुभाई और उनके पार्टनर्स को तीन साल की साधारण कैद की सजा सुनाई। साथ ही 5,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। जुर्माना नहीं देने पर छह महीने की अतिरिक्त जेल का आदेश था। लेकिन भानुभाई ने हार नहीं मानी और फैसले को चुनौती देते रहे। आखिरकार मामला गुजरात हाई कोर्ट तक पहुंचा।
फूड इंस्पेक्टर की एक गलती बनी अहम
गुजरात हाई कोर्ट में केस का रुख बदलने की सबसे बड़ी वजह सैंपल लेने का तरीका बना। फूड इंस्पेक्टर ने खुद माना था कि काजू कतली का सैंपल जिस कांच की बोतल में रखा गया था, उसे सैंपल लेने से पहले साफ नहीं किया गया था।
प्रिवेंशन ऑफ फूड अडल्टरेशन 1955 के Rule 14 के मुताबिक जांच के लिए खाने का सैंपल साफ और सूखी बोतल, जार या दूसरे उपयुक्त कंटेनर में लिया जाना जरूरी था। यानी सैंपल लेने की प्रक्रिया में ही जरूरी नियम का पालन नहीं हुआ था।
एल्युमिनियम से नुकसान का सबूत भी नहीं मिला
मामले में दूसरा बड़ा सवाल था कि क्या काजू कतली पर मिला एल्युमिनियम फॉइल सेहत के लिए नुकसानदायक था? हाई कोर्ट ने पाया कि अदालत के सामने ऐसा कोई वैज्ञानिक या मेडिकल सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे साबित हो कि इस मामले में मिला एल्युमिनियम फॉइल इंसानों की सेहत के लिए हानिकारक था या काजू कतली खाने लायक नहीं थी।
कोर्ट का कहना था कि सिर्फ एल्युमिनियम फॉइल मिलने भर से खाने की चीज को मिलावटी नहीं माना जा सकता, जब उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने का सबूत रिकॉर्ड पर न हो।
31 साल पुराने केस में मिली राहत
17 जून 2026 को जस्टिस हेमंत एम प्रच्छक की गुजरात हाई कोर्ट बेंच ने दुकानदार के पक्ष में फैसला बरकरार रखा। हाई कोर्ट ने माना कि आरोपी को कथित अपराध से जोड़ने के लिए पर्याप्त और भरोसेमंद सबूत नहीं हैं। अदालत ने अपीलीय अदालत के बरी करने के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया और उसके खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी। साल 1995 में 96 रुपये की काजू कतली से शुरू हुआ मामला करीब 31 साल बाद खत्म हुआ।





